हाल ही में एक अखबार द्वारा कंज्यूमर एक्सपेंडेचर सर्वे यानी देश में लोगों द्वारा खर्च किये जा रहे धन के ब्योरे की रिपार्ट प्रकाशित की गयी थी। इस रिपोर्ट में दावा किया गया है कि देश में उपभोक्ता खर्च में 3.7 फीसद की गिरावट आई है और यह आंकड़ा ग्रामीण क्षेत्र में 8.8 फीसद तक पहुंच जाता है। नेशनल स्टेटिकल ऑफ़िस, एनएसओ द्वारा जारी किए जाने वाले इस सर्वे को सरकार ने 2017-18 के आंकड़े जारी नहीं करने का फैसला किया था। ये वही आंकड़े हैं जिससे देश में गरीबी, भुखमरी का अंदाज़ा लगाया जाता है। हर पांच साल में जारी होने वाले कंज्यूमर एक्सपेंडेचर सर्वे को इस बार जारी न करने के पीछे सरकार ने भारी विषमता और खराब क्वालिटी की बात कही है।
नोटबन्दी और जीएसटी के लागू होने के बाद देश की अर्थव्यवस्था में छोटे उद्योग या तो खत्म हो गए या तो उन पर अत्यधिक दवाब पड़ गया। ऐसे में 2024 तक 5 ट्रिलियन की इकॉनमी और 2032 तक 10 ट्रिलियन इकॉनमी बनाने के सपने पर तब और चोट लगी जब एक रिपोर्ट के माध्यम से पता चला कि देश में बेरोजगारी दर 6.8 फीसद पहुंच गई है। ये बेरोजगारी दर 1972 के बाद सबसे ज्यादा है।
भारत की अर्थव्यवस्था नोटबन्दी और जीएसटी जैसे मूल सुधारों के बाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में महंगी तेल की कीमतों, रुपये का गिरता भाव और चीन अमेरिका के ट्रेड वार के चलते दवाब में है। जिससे विकास दर गिरने जैसी नौबत आई है। ऐसे में उपभोगता या तो सतर्क हो गए या पैसे को बाजार में लगाने से डरने लगे हैं। नतीजतन देश में उपभोग इतना कम होता है कि मारुति जैसी दिग्गज कंपनी को अपना कारखाना कुछ दिनों के लिए बंद करना पड़ता है और नौकरियों में भारी गिरावट आती है। जानकार इस स्तिथि को मंदी न मानकर सुस्ती कहते हैं। अर्थशास्त्री भरत झुनझुनवाला बीबीसी को दिए अपने एक साक्षात्कार में कहते हैं कि 'हम इसे अभी मंदी नहीं कह सकते, यह सुस्ती जरूर है। मंदी की स्तिथि 1991 में बनी थी तब हमारे पास विदेशी मुद्रा भंडार सिर्फ 28 अरब डॉलर ही बचा था जो कि अब 491 अरब डॉलर है। आज की स्तिथि बिल्कुल अलग है।'
सरकार ने मंदी से निपटने के लिए बैंकों के विलय किये जिससे कम पूंजी वाले बैंको की पूंजी बढा कर बैंको को मजबूत किया जा सके। लोगों को ऋण देने के लिए बैंको की स्तिथि मजबूत हो। इसके अलावा इसी साल सितंबर माह में कारपोरेट घरानों पर लगने वाले टैक्स की दर को 30 फीसद से घटाकर 22 फीसद कर दिया व मिनिमम अल्टरनेट टैक्स को 18.5 फीसद से घटाकर 15 फीसद और 31 मार्च 2023 तक भारत में व्यापार शुरू करने वाली कंपनियों के लिए 25 फीसद से 15 फीसद तक ले आये। इसका मकसद भी सीधा हैं जैसे-जैसे कर कम होंगे देश में व्यापार के लिए माहौल मुफीद होगा जिससे न सिर्फ रोजगार सृजन होगा बल्कि बाहरी कंपनियों को भी बड़े पैमाने पर लुभाने में मदद मिलेगी। इसके अलावा रिज़र्व बैंक से 1.76 लाख करोड़ रुपये का अतिरिक्त धन लेना भी सरकार की पूंजी जुटा कर इंडस्ट्री की सहायता व रोजगार सृजन ही मक़सद था।
जो भी हो सरकार के दनादन कदम उठाने के बावजूद अर्थव्यस्था की विकासदर लगातार दूसरी तिमाही में नकारात्मक रही। जिससे न सिर्फ हमारे एशिया की महाशक्ति बनने के सपने को खतरा है बल्कि अर्थव्यवस्था में आंतरिक जरूरतों के पैमाने पर भी बड़ा सरदर्द है।

