Sunday, 26 April 2020

10 ट्रिलियन इकॉनमी के सपने तले 'बेजार' होती अर्थव्यवस्था

चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही (अप्रैल से जून) में सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी की विकास दर 5 फीसद रही। यह पिछले साल की आखरी तिमाही (जनवरी से मार्च) में यह 5.8 फीसद थी। किसी देश की अर्थव्यवस्था में यदि लगातार तीन तिमाहियों तक नकारात्मकता रहती है तो उसे आर्थिक मंदी मान लेते हैं।
हाल ही में एक अखबार द्वारा कंज्यूमर एक्सपेंडेचर सर्वे यानी देश में लोगों द्वारा खर्च किये जा रहे धन के ब्योरे की रिपार्ट प्रकाशित की गयी थी। इस रिपोर्ट में दावा किया गया है कि देश में उपभोक्ता खर्च में 3.7 फीसद की गिरावट आई है और यह आंकड़ा ग्रामीण क्षेत्र में 8.8 फीसद तक पहुंच  जाता है। नेशनल स्टेटिकल ऑफ़िस, एनएसओ द्वारा जारी किए जाने वाले इस सर्वे को सरकार ने 2017-18 के आंकड़े जारी नहीं करने का फैसला किया था। ये वही आंकड़े हैं जिससे देश में गरीबी, भुखमरी का अंदाज़ा लगाया जाता है। हर पांच साल में जारी होने वाले कंज्यूमर एक्सपेंडेचर सर्वे को इस बार जारी न करने के पीछे सरकार ने भारी विषमता और खराब क्वालिटी की बात कही है।
नोटबन्दी और जीएसटी के लागू होने के बाद देश की अर्थव्यवस्था में छोटे उद्योग या तो खत्म हो गए या तो उन पर अत्यधिक दवाब पड़ गया। ऐसे में 2024 तक 5 ट्रिलियन की इकॉनमी और 2032 तक 10 ट्रिलियन इकॉनमी बनाने के सपने पर तब और चोट लगी जब एक रिपोर्ट के माध्यम से पता चला कि देश में बेरोजगारी दर 6.8 फीसद पहुंच गई है। ये बेरोजगारी दर 1972 के बाद सबसे ज्यादा है।
भारत की अर्थव्यवस्था नोटबन्दी और जीएसटी जैसे मूल सुधारों के बाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में महंगी तेल की कीमतों, रुपये का गिरता भाव और चीन अमेरिका के ट्रेड वार के चलते दवाब में है। जिससे विकास दर गिरने जैसी नौबत आई है। ऐसे में उपभोगता या तो सतर्क हो गए या पैसे को बाजार में लगाने से डरने लगे हैं। नतीजतन देश में उपभोग इतना कम होता है कि मारुति जैसी दिग्गज कंपनी को अपना कारखाना कुछ दिनों के लिए बंद करना पड़ता है और नौकरियों में भारी गिरावट आती है। जानकार इस स्तिथि को मंदी न मानकर सुस्ती कहते हैं। अर्थशास्त्री भरत झुनझुनवाला बीबीसी को दिए अपने एक साक्षात्कार में कहते हैं कि 'हम इसे अभी मंदी नहीं कह सकते, यह सुस्ती जरूर है। मंदी की स्तिथि 1991 में बनी थी तब हमारे पास विदेशी मुद्रा भंडार सिर्फ 28 अरब डॉलर ही बचा था जो कि अब 491 अरब डॉलर है। आज की स्तिथि बिल्कुल अलग है।'
सरकार ने मंदी से निपटने के लिए बैंकों के विलय किये जिससे कम पूंजी वाले बैंको की पूंजी बढा कर बैंको को मजबूत किया जा सके। लोगों को ऋण देने के लिए बैंको की स्तिथि मजबूत हो। इसके अलावा इसी साल सितंबर माह में कारपोरेट घरानों पर लगने वाले टैक्स की दर को 30 फीसद से घटाकर 22 फीसद कर दिया व मिनिमम अल्टरनेट टैक्स को 18.5 फीसद से घटाकर 15 फीसद और 31 मार्च 2023 तक भारत में व्यापार शुरू करने वाली कंपनियों के लिए 25 फीसद से 15 फीसद तक ले आये। इसका मकसद भी सीधा हैं जैसे-जैसे कर कम होंगे  देश में व्यापार के लिए माहौल मुफीद होगा जिससे न सिर्फ रोजगार सृजन होगा बल्कि बाहरी कंपनियों को भी बड़े पैमाने पर लुभाने में मदद मिलेगी। इसके अलावा रिज़र्व बैंक से 1.76 लाख करोड़ रुपये का अतिरिक्त धन लेना भी सरकार की पूंजी जुटा कर इंडस्ट्री की सहायता व रोजगार सृजन ही मक़सद था।
जो भी हो सरकार के दनादन कदम उठाने के बावजूद अर्थव्यस्था की विकासदर लगातार दूसरी तिमाही में नकारात्मक रही। जिससे न सिर्फ हमारे एशिया की महाशक्ति बनने के सपने को खतरा है बल्कि अर्थव्यवस्था में आंतरिक जरूरतों के पैमाने पर भी बड़ा सरदर्द है।

Friday, 24 April 2020

एनसीआरबी की रिपोर्ट से खुलासा कि घरेलू हिंसा में दिल्ली अव्वल!

"वर्ष 2019 में एनसीटी दिल्ली में प्रतिदिन औसतन छह महिलाओं के साथ बलात्कार किया गया। 2018 के 1921 मामलों की तुलना में 2019 के नवंबर तक बलात्कार के कुल 1947 मामले दिल्ली पुलिस द्वारा  दर्ज किए गए थे।"

ये सारे मामले दिल्ली में पिछले एक साल के दरमियान हुई घरेलू हिंसा में महिलाओं के उत्पीड़न के हैं। देश और दुनियं में एक ओर जंहा महिला सशक्तिकरण की डींगे खुल कर हाँकी जाती हैं वँहा ये आंकड़े एक झटके में सरकार की पोल खोल देते हैं। भारत सरकार पिछले कई दशकों से महिलाओं के ऊपर उत्पीड़न रोकने के लिए कानूनों में बदलाव कर रही है साथ ही इसके अलावा महिला सशक्तिकरण के लिए कई अहम बदलाव भी किये गए हैं। 1992 में महिला आयोग का गठन इसी का परिणाम है।

 पति और ससुराल वाले मामले 498-ए / 406 आईपीसी (भारतीय दंड संहिता) के तहत दर्ज मामलों की संख्या में 17% की वृद्धि देखी गई। 2019 में पति और ससुराल वालों द्वारा किये गए अपराध के 3187 मामले दर्ज हुए जबकि 2018 में यह संख्या 2716 थी। दहेज मृत्यु ने 106 मामलों के साथ 25% की गिरावट दर्ज की। 2018 में ऐसे 133 मामले दर्ज किए गए थे।

एनसीआर में कानून व्यवस्था केंद्र सरकार के अधीन है। यही केंद्र और राज्य सरकार के बीच संघर्ष का विषय है। साल 2018 में आम आदमी पार्टी ने दिल्ली पुलिस को राज्य सरकार के अधीन लाने का प्रस्ताव पारित किया था। AAP ने दिल्ली पुलिस को 'भाजपा की सशस्त्र शाखा' भी कहा था और गृह मंत्री अमित शाह को शहर की विफल कानून व्यवस्था के लिए दोषी ठहराया था। कमोबेश हालात जस के तस अभी भी हैं। राष्ट्ररीय सुरक्षा की प्राथमिकता के बीच ये मामले दब से जाते हैं।

एनसीआरबी  से प्राप्त आंकड़ों से साफ साफ पता चलता है कि 2017 की रिपोर्ट में देश में कुल 32,559 बलात्कार के मामले दर्ज किए गए थे। इसमें अकेले दिल्ली में लगभग 4% मामले दर्ज किए गए थे जो कि भारत की आबादी का सिर्फ़ 1.5% और देश के कुल भौगोलिक क्षेत्र का 0.04% है। यही नहीं ये आंकड़े देश के कई छोटे छोटे राज्यवार आंकड़ों को मिला कर भी उन पर इक्कीस बैठते हैं।

हालांकि, ये आंकड़े भी वास्तविक तस्वीर नहीं दिखाते हैं क्योंकि कई मामले अपंजीकृत होते हैं या अंडर-रिपोर्ट किए जाते हैं क्योंकि NCRB प्रिंसिपल ऑफेंस नियम का पालन करता है और कुछ IPC / SLL मामलों की संभावना कम होती है क्योंकि वे बड़े अपराधों के तहत छिपे होते हैं ।

'प्रमुख अपराध नियम' के तहत, जब एक ही प्राथमिकी के तहत कई अपराध दर्ज किए जाते हैं, तो केवल सबसे जघन्य अपराध (अधिकतम सजा) को NCRB द्वारा गिनती इकाई माना जाता है। उदाहरण के लिए बलात्कार के साथ हत्या को हत्या और दहेज निषेध अधिनियम को भारतीय दंड संहिता 304B के साथ लागू करने पर दहेज हत्या का मामला बनता है। दिल्ली किसी भी अन्य महानगरीय शहर की तुलना में महिलाओं के खिलाफ अपराध का केंद्र बना हुआ है। सामाजिक-आर्थिक खाई, प्रवासी आबादी और अप्रभावी कानून प्रवर्तन के कारण यहाँ महिलाओं के खिलाफ अपराध में वृद्धि हुई है।

देश के आलाकमान और सरकारों के लिए ये चुनौती बहुत बड़ी है कि देश में बड़े पैमानें पर हो रही घरेलू हिंसाओं से निपटने के लिए आज से करीब 70 साल पहले यानी 1959 में जिस 'दहेज प्रथा कानून' को इतना शक्तिशाली बनाया गया था पर आज इतने दिन बाद भी वो वैसा ही है। सरकार को घरेलू हिंसा रोकने और महिला सशक्तिकरण के तमाम कपोल दावों के बीच सतही तौर पर कार्य करना होगा।