"वर्ष 2019 में एनसीटी दिल्ली में प्रतिदिन औसतन छह महिलाओं के साथ बलात्कार किया गया। 2018 के 1921 मामलों की तुलना में 2019 के नवंबर तक बलात्कार के कुल 1947 मामले दिल्ली पुलिस द्वारा दर्ज किए गए थे।"
ये सारे मामले दिल्ली में पिछले एक साल के दरमियान हुई घरेलू हिंसा में महिलाओं के उत्पीड़न के हैं। देश और दुनियं में एक ओर जंहा महिला सशक्तिकरण की डींगे खुल कर हाँकी जाती हैं वँहा ये आंकड़े एक झटके में सरकार की पोल खोल देते हैं। भारत सरकार पिछले कई दशकों से महिलाओं के ऊपर उत्पीड़न रोकने के लिए कानूनों में बदलाव कर रही है साथ ही इसके अलावा महिला सशक्तिकरण के लिए कई अहम बदलाव भी किये गए हैं। 1992 में महिला आयोग का गठन इसी का परिणाम है।
पति और ससुराल वाले मामले 498-ए / 406 आईपीसी (भारतीय दंड संहिता) के तहत दर्ज मामलों की संख्या में 17% की वृद्धि देखी गई। 2019 में पति और ससुराल वालों द्वारा किये गए अपराध के 3187 मामले दर्ज हुए जबकि 2018 में यह संख्या 2716 थी। दहेज मृत्यु ने 106 मामलों के साथ 25% की गिरावट दर्ज की। 2018 में ऐसे 133 मामले दर्ज किए गए थे।
एनसीआर में कानून व्यवस्था केंद्र सरकार के अधीन है। यही केंद्र और राज्य सरकार के बीच संघर्ष का विषय है। साल 2018 में आम आदमी पार्टी ने दिल्ली पुलिस को राज्य सरकार के अधीन लाने का प्रस्ताव पारित किया था। AAP ने दिल्ली पुलिस को 'भाजपा की सशस्त्र शाखा' भी कहा था और गृह मंत्री अमित शाह को शहर की विफल कानून व्यवस्था के लिए दोषी ठहराया था। कमोबेश हालात जस के तस अभी भी हैं। राष्ट्ररीय सुरक्षा की प्राथमिकता के बीच ये मामले दब से जाते हैं।
एनसीआरबी से प्राप्त आंकड़ों से साफ साफ पता चलता है कि 2017 की रिपोर्ट में देश में कुल 32,559 बलात्कार के मामले दर्ज किए गए थे। इसमें अकेले दिल्ली में लगभग 4% मामले दर्ज किए गए थे जो कि भारत की आबादी का सिर्फ़ 1.5% और देश के कुल भौगोलिक क्षेत्र का 0.04% है। यही नहीं ये आंकड़े देश के कई छोटे छोटे राज्यवार आंकड़ों को मिला कर भी उन पर इक्कीस बैठते हैं।
हालांकि, ये आंकड़े भी वास्तविक तस्वीर नहीं दिखाते हैं क्योंकि कई मामले अपंजीकृत होते हैं या अंडर-रिपोर्ट किए जाते हैं क्योंकि NCRB प्रिंसिपल ऑफेंस नियम का पालन करता है और कुछ IPC / SLL मामलों की संभावना कम होती है क्योंकि वे बड़े अपराधों के तहत छिपे होते हैं ।
'प्रमुख अपराध नियम' के तहत, जब एक ही प्राथमिकी के तहत कई अपराध दर्ज किए जाते हैं, तो केवल सबसे जघन्य अपराध (अधिकतम सजा) को NCRB द्वारा गिनती इकाई माना जाता है। उदाहरण के लिए बलात्कार के साथ हत्या को हत्या और दहेज निषेध अधिनियम को भारतीय दंड संहिता 304B के साथ लागू करने पर दहेज हत्या का मामला बनता है। दिल्ली किसी भी अन्य महानगरीय शहर की तुलना में महिलाओं के खिलाफ अपराध का केंद्र बना हुआ है। सामाजिक-आर्थिक खाई, प्रवासी आबादी और अप्रभावी कानून प्रवर्तन के कारण यहाँ महिलाओं के खिलाफ अपराध में वृद्धि हुई है।
देश के आलाकमान और सरकारों के लिए ये चुनौती बहुत बड़ी है कि देश में बड़े पैमानें पर हो रही घरेलू हिंसाओं से निपटने के लिए आज से करीब 70 साल पहले यानी 1959 में जिस 'दहेज प्रथा कानून' को इतना शक्तिशाली बनाया गया था पर आज इतने दिन बाद भी वो वैसा ही है। सरकार को घरेलू हिंसा रोकने और महिला सशक्तिकरण के तमाम कपोल दावों के बीच सतही तौर पर कार्य करना होगा।
ये सारे मामले दिल्ली में पिछले एक साल के दरमियान हुई घरेलू हिंसा में महिलाओं के उत्पीड़न के हैं। देश और दुनियं में एक ओर जंहा महिला सशक्तिकरण की डींगे खुल कर हाँकी जाती हैं वँहा ये आंकड़े एक झटके में सरकार की पोल खोल देते हैं। भारत सरकार पिछले कई दशकों से महिलाओं के ऊपर उत्पीड़न रोकने के लिए कानूनों में बदलाव कर रही है साथ ही इसके अलावा महिला सशक्तिकरण के लिए कई अहम बदलाव भी किये गए हैं। 1992 में महिला आयोग का गठन इसी का परिणाम है।
पति और ससुराल वाले मामले 498-ए / 406 आईपीसी (भारतीय दंड संहिता) के तहत दर्ज मामलों की संख्या में 17% की वृद्धि देखी गई। 2019 में पति और ससुराल वालों द्वारा किये गए अपराध के 3187 मामले दर्ज हुए जबकि 2018 में यह संख्या 2716 थी। दहेज मृत्यु ने 106 मामलों के साथ 25% की गिरावट दर्ज की। 2018 में ऐसे 133 मामले दर्ज किए गए थे।
एनसीआर में कानून व्यवस्था केंद्र सरकार के अधीन है। यही केंद्र और राज्य सरकार के बीच संघर्ष का विषय है। साल 2018 में आम आदमी पार्टी ने दिल्ली पुलिस को राज्य सरकार के अधीन लाने का प्रस्ताव पारित किया था। AAP ने दिल्ली पुलिस को 'भाजपा की सशस्त्र शाखा' भी कहा था और गृह मंत्री अमित शाह को शहर की विफल कानून व्यवस्था के लिए दोषी ठहराया था। कमोबेश हालात जस के तस अभी भी हैं। राष्ट्ररीय सुरक्षा की प्राथमिकता के बीच ये मामले दब से जाते हैं।
एनसीआरबी से प्राप्त आंकड़ों से साफ साफ पता चलता है कि 2017 की रिपोर्ट में देश में कुल 32,559 बलात्कार के मामले दर्ज किए गए थे। इसमें अकेले दिल्ली में लगभग 4% मामले दर्ज किए गए थे जो कि भारत की आबादी का सिर्फ़ 1.5% और देश के कुल भौगोलिक क्षेत्र का 0.04% है। यही नहीं ये आंकड़े देश के कई छोटे छोटे राज्यवार आंकड़ों को मिला कर भी उन पर इक्कीस बैठते हैं।
हालांकि, ये आंकड़े भी वास्तविक तस्वीर नहीं दिखाते हैं क्योंकि कई मामले अपंजीकृत होते हैं या अंडर-रिपोर्ट किए जाते हैं क्योंकि NCRB प्रिंसिपल ऑफेंस नियम का पालन करता है और कुछ IPC / SLL मामलों की संभावना कम होती है क्योंकि वे बड़े अपराधों के तहत छिपे होते हैं ।
'प्रमुख अपराध नियम' के तहत, जब एक ही प्राथमिकी के तहत कई अपराध दर्ज किए जाते हैं, तो केवल सबसे जघन्य अपराध (अधिकतम सजा) को NCRB द्वारा गिनती इकाई माना जाता है। उदाहरण के लिए बलात्कार के साथ हत्या को हत्या और दहेज निषेध अधिनियम को भारतीय दंड संहिता 304B के साथ लागू करने पर दहेज हत्या का मामला बनता है। दिल्ली किसी भी अन्य महानगरीय शहर की तुलना में महिलाओं के खिलाफ अपराध का केंद्र बना हुआ है। सामाजिक-आर्थिक खाई, प्रवासी आबादी और अप्रभावी कानून प्रवर्तन के कारण यहाँ महिलाओं के खिलाफ अपराध में वृद्धि हुई है।
देश के आलाकमान और सरकारों के लिए ये चुनौती बहुत बड़ी है कि देश में बड़े पैमानें पर हो रही घरेलू हिंसाओं से निपटने के लिए आज से करीब 70 साल पहले यानी 1959 में जिस 'दहेज प्रथा कानून' को इतना शक्तिशाली बनाया गया था पर आज इतने दिन बाद भी वो वैसा ही है। सरकार को घरेलू हिंसा रोकने और महिला सशक्तिकरण के तमाम कपोल दावों के बीच सतही तौर पर कार्य करना होगा।
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